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Dahej Pratha Kavita


लानत है दहेज की हिंदू समाज पर

जरा विचार कीजिए आप इस रिवाज पर 

मैं सुनाता हूं आपको एक सत्य कहानी

थी शहर के पास एक बस्ती पुरानी 

कन्या थी वहां उसने की तस्वीर नूरानी 

पर एक कमी थी उसमें उसका बाप नहीं था

ससुरम्य तो थी पर सुर का आधार नहीं था

मैं कहूं कि उसके सिर पर ईश्वर का हाथ नहीं था

रहती वह भाई के पास थी 

कैसे कहूं कि जिंदगी उसी की कितनी उदास थी 

भाई ने बहन का रिश्ता जोड़ना चाहा 

और भार सर्वगुण संपन्न पर छोड़ना चाहा

जो कुछ है उसके पास वह सब कुछ दे आऊंगा

बहिन की खुशी में आंसू बहाउंगा 

वह दिन भी आया जब घर में बारात आई

मानो कयामत कि आज रात लाई 

वायदे को खिलाफ कर मांगा जब दहेज गया 

लड़के व उसकी बहन पर वज्र था गिर गया 

दूल्हे ने बाप को अपने खूब समझाया

मरने के बाद न जाता धन माया

पर कुछ न सोचा बाप ने बारात वापस लौट गई

भगवान ऐसी घड़ी उनसे कैसे सही गई 

प्रभु! मेरे साथ क्या अंधेरा हो गया 

लड़की का भाई कहकर वहीं ढेर हो गया 

लड़की ने भी अपना जीवन समाप्त कर दिया 

भारत में पैसे के धनी का सिर नीचा कर दिया 

लानत है दहेज की हिंदू समाज पर

जरा विचार कीजिए इस रिवाज पर

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